भाववाच्य संरचनाएँ
भाववाच्य में क्रिया की संभावना, असमर्थता या अनुभव पर ज़ोर होता है, कर्ता पर नहीं। ऐसे वाक्य अक्सर 'से' या दत्तिव संरचना के साथ आते हैं।
- मुझसे यह काम नहीं होगा।
- उससे चला नहीं जाता।
- यहाँ बैठा नहीं जा सकता।
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भाववाच्य में क्रिया की संभावना, असमर्थता या अनुभव पर ज़ोर होता है, कर्ता पर नहीं। ऐसे वाक्य अक्सर 'से' या दत्तिव संरचना के साथ आते हैं।
ये रूप एक क्रिया को दूसरी क्रिया से जोड़ते हैं और तरीका, समय या क्रम बताते हैं। 'करके' पूर्ण क्रिया के बाद और 'करते हुए' साथ-साथ चल रही क्रिया के लिए आता है।
संबंधवाची कृदंत संज्ञा को क्रिया से बनी विशेषता देते हैं। 'किया हुआ' पूर्ण क्रिया से जुड़ा गुण और 'करने वाला' कर्ता, आदत या निकट भविष्य का अर्थ दे सकता है।
क्रिया का -ना रूप संज्ञा, उद्देश्य, कारण, तुलना या परहेज़ जैसे अर्थों में प्रयोग होता है। परसर्ग जुड़ने पर इसका तिर्यक रूप 'करने' बनता है।
हिंदी में relative-correlative संरचना बहुत आम है: जो...वह, जहाँ...वहाँ, जैसा...वैसा। इससे दो उपवाक्य आपस में जुड़ते हैं।
ध्यान दें: अंग्रेज़ी की तरह केवल relative clause रख देना पर्याप्त नहीं; हिंदी में कई बार 'जो' के साथ मुख्य वाक्य में 'वह/वही' भी चाहिए।
'कि' से बना उपवाक्य पूरे वाक्य में संज्ञा की तरह काम कर सकता है: किसी बात को कहना, सोचना, मानना या जानना। बोलचाल में कभी-कभी 'कि' छूट भी सकता है।
परोक्ष कथन में किसी की बात को अपने शब्दों में बताया जाता है। इसमें सर्वनाम, काल, स्थान और समय-सूचक शब्द संदर्भ के अनुसार बदल सकते हैं।
प्रत्यक्ष कथन में वक्ता के मूल शब्द उद्धरण में आते हैं, जबकि अप्रत्यक्ष कथन में वही बात वाक्य में मिलाकर कही जाती है। शैली और औपचारिकता के अनुसार दोनों का चयन होता है।
शर्तीय वाक्य में एक उपवाक्य शर्त बताता है और दूसरा परिणाम। 'अगर/यदि' शर्त शुरू करते हैं और 'तो' परिणाम को स्पष्ट कर सकता है।
उद्देश्य वाक्य बताते हैं कि कोई काम किस मकसद से किया गया। 'ताकि' के बाद उपवाक्य आता है, जबकि 'के लिए' संज्ञा या क्रिया-रूप के साथ आता है।
कारण और परिणाम जोड़ने के लिए क्योंकि, चूँकि और इसलिए प्रयोग होते हैं। 'क्योंकि/चूँकि' कारण बताते हैं और 'इसलिए' परिणाम की ओर ले जाता है।
विरोध या contrast दिखाने के लिए हालांकि, फिर भी, जबकि जैसे शब्द आते हैं। ये दो विचारों के बीच अपेक्षा-विरोध या अंतर दिखाते हैं।
तुलना में 'से' अधिक/कम का संबंध बताता है, 'जैसा' समानता और 'जितना…उतना' अनुपात या बराबरी का संबंध दिखाता है।
'सबसे' superlative अर्थ देता है, जबकि अधिक/कम तुलना या मात्रा में अंतर दिखाते हैं। ये विशेषण, क्रियाविशेषण और संज्ञा-समूहों के साथ प्रयोग हो सकते हैं।
अनिश्चित शब्द व्यक्ति, वस्तु, स्थान या समय को अस्पष्ट रूप से बताते हैं। संदर्भ के अनुसार ये सकारात्मक, प्रश्नवाचक या संभाव्य अर्थ ले सकते हैं।
नकारात्मक सर्वनाम अनुपस्थिति या शून्यता बताते हैं। हिंदी में 'नहीं' के साथ कोई/कुछ जैसे शब्द मिलकर नकारात्मक अर्थ बनाते हैं।
ही, भी और तो छोटे लेकिन शक्तिशाली focus particles हैं। 'ही' विशेष बल देता है, 'भी' जोड़ता है और 'तो' contrast, topic या अपेक्षा का संकेत दे सकता है।
जटिल वाक्य में मुख्य वाक्य के साथ एक या अधिक उपवाक्य जुड़े होते हैं। उपवाक्य कारण, शर्त, उद्देश्य, संबंध, समय या कथन का काम कर सकते हैं।
औपचारिक हिंदी में संज्ञा से पहले और बाद में कई विशेषण, संबंधवाची तत्व और परसर्गीय पद जुड़ सकते हैं। इससे अर्थ सघन होता है लेकिन वाक्य पढ़ना कठिन हो सकता है।
उन्नत संबंधवाचक संरचनाएँ केवल संज्ञा पहचानने के लिए नहीं, बल्कि पूरे विचारों को व्यवस्थित करने के लिए भी प्रयोग होती हैं। इनमें जो, जहाँ, जब, जैसा, जितना जैसे रूप आते हैं।
ये correlative जोड़े दो हिस्सों को संतुलित करते हैं। पहला हिस्सा आधार या शर्त देता है और दूसरा उसका परिणाम, समानता या अनुपात बताता है।
उन्नत स्तर पर 'ने' का प्रयोग क्रिया की सकर्मकता, पक्ष, कर्म-चिह्नन और बोली/शैली से प्रभावित होता है। कुछ क्रियाएँ अपेक्षित पैटर्न से अलग व्यवहार कर सकती हैं।
ध्यान दें: मानक हिंदी में 'उसने बहुत हँसा' सामान्यतः स्वीकार्य नहीं है; अकर्मक क्रिया के साथ प्रायः 'वह बहुत हँसा' कहा जाता है।
हिंदी क्रिया-सहमति कर्ता, कर्म, सम्मान, 'ने', 'को' और कभी-कभी डिफ़ॉल्ट पुल्लिंग एकवचन से प्रभावित होती है। इसलिए केवल कर्ता देखकर क्रिया तय करना पर्याप्त नहीं होता।
ध्यान दें: 'ने' और 'को' वाले वाक्यों में क्रिया हमेशा कर्ता से सहमत नहीं होती।
संयुक्त क्रियाएँ क्रिया के परिणाम, वक्ता के रुख, लाभ/हानि, अचानकपन और पूर्णता की सूक्ष्म छाया देती हैं। 'करना', 'कर लेना', 'कर देना' और 'कर जाना' समान नहीं हैं।
वेक्टर क्रियाएँ aspect और attitude दोनों को प्रभावित कर सकती हैं। वे बताती हैं कि क्रिया पूरी हुई, अचानक हुई, अपने लिए हुई, किसी और के लिए हुई या अनियंत्रित ढंग से हुई।
Causative और passive मिलकर ऐसे वाक्य बनाते हैं जिनमें काम करवाया भी गया हो और ध्यान कर्ता से हटकर प्रक्रिया पर भी हो। यह औपचारिक और प्रशासनिक हिंदी में उपयोगी है।
जब कर्ता अज्ञात, अप्रासंगिक या सामान्य हो, तो हिंदी passive, भाववाच्य या अवैयक्तिक संरचना का प्रयोग करती है। इससे वाक्य अधिक तटस्थ या औपचारिक बनता है।
हिंदी में होगा, रहा होगा, चाहिए होगा जैसे रूप अनुमान, संभावना और अपेक्षित अनिवार्यता बताते हैं। संदर्भ से पता चलता है कि वक्ता कितना आश्वस्त है।
काल्पनिक वाक्य वास्तविकता से अलग स्थिति की कल्पना करते हैं। इनमें अगर, होता, तो, पाता, सकता जैसे रूप अक्सर आते हैं।
Concessive संरचनाएँ बताती हैं कि किसी बाधा या विरोधी स्थिति के बावजूद परिणाम नहीं बदलता। हिंदी में चाहे, भले ही, फिर भी, तथापि जैसे रूप प्रयोग होते हैं।
क्रिया या पूरे विचार को संज्ञा-रूप में बदलना संज्ञाकरण है। औपचारिक, अकादमिक और प्रशासनिक हिंदी में इससे वाक्य अधिक सघन और तटस्थ बनते हैं।
संस्कृतनिष्ठ हिंदी अधिक औपचारिक, साहित्यिक या प्रशासनिक लगती है, जबकि बोलचाल की हिंदी सरल और प्राकृतिक संवाद के निकट होती है। दोनों रजिस्टरों का चयन प्रसंग पर निर्भर करता है।
रजिस्टर भाषा की सामाजिक और प्रसंगगत शैली है। शब्द-चयन, वाक्य-लंबाई, विनम्रता और व्याकरणिक संरचना रजिस्टर के अनुसार बदलती है।
हिंदी में विनम्रता केवल शब्दों से नहीं, बल्कि सर्वनाम, क्रिया-सहमति, संबोधन और वाक्य-रचना से भी व्यक्त होती है। तुम, आप, कीजिए, करिए, कर दो जैसे रूप सामाजिक दूरी बताते हैं।
बातचीत और लेखन में दोहराव से बचने के लिए शब्द छोड़े जा सकते हैं या संदर्भ-सूचक तत्वों से बदले जा सकते हैं। यह तभी स्पष्ट होता है जब संदर्भ साझा हो।
Discourse markers पाठ में विचारों का संबंध स्पष्ट करते हैं। वे जोड़, विरोध, परिणाम, निष्कर्ष या स्पष्टीकरण का संकेत देते हैं।
हिंदी में वाक्य का आरंभ अक्सर उस सूचना से होता है जो विषय या पहले से ज्ञात है। नई या महत्त्वपूर्ण सूचना बाद में आ सकती है, और particles से focus बदला जा सकता है।
हिंदी का मूल शब्द क्रम SOV है, पर बल, विरोध और topic के लिए पदों का क्रम बदला जा सकता है। ऐसा बदलाव अर्थ और focus को प्रभावित करता है।
विराम-चिह्न जटिल वाक्यों में अर्थ, ठहराव और उपवाक्य-सीमा स्पष्ट करते हैं। अल्पविराम, पूर्णविराम, उद्धरण-चिह्न और अर्धविराम लेखन को अधिक पठनीय बनाते हैं।
तारतम्य का अर्थ है कि वाक्य और अनुच्छेद अर्थपूर्ण क्रम में जुड़े हों। सर्वनाम, पुनरुक्ति, समानार्थक शब्द, discourse markers और logical progression पाठ को संगठित बनाते हैं।
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